शिवसेना शिरोमणी बाल ठाकरे को आखिर सदबुद्धि आ ही गयी और उन्होंने मांग की है कि हिन्दुओं को भी आत्मघाती दस्ता बना ही लेना चाहिए। हां यह तो सही है टिट फार टैट या विषह विषस्य औषधम। जैसे को तैसा मिलना ही चाहिए अब अगर आपको बैल सींग मारे तो आपको भी सींग लगवा लेना चाहिए। पर एक शंका होती है कि क्या ठाकरे हिन्दू नहीं हैं या फिर वह हिन्दुओं के आदर्श होने से डरते हैं। नहीं तो क्या कारण है कि वे आगे आकर उनका पथ प्रदर्शन नहीं करते। वे आत्मघात कर राह दिखाएं सारे हिन्दू उनकी राह पर चल पडेंगे। हिन्दू तो भेंड हैं जिस राह उनका नेता चलेगा उस राह चल देंगे उनके अपने विचार तो होते नहीं। वे तो मूक भक्त जीव हैं।
क्या तमाशा है कि तमाम भाजपा नेता अपने इस सहयोगी दल के नेता के इस बयान की निंदा कर रहे हैं। वे तो ठाकरे की मूल भावना को समझ ही नहीं रहे। दरअसल ठाकरे इस तरह हिन्दुओं के बीच से तमाम अतिवादी तत्वों का सफाया चाहते हैं। कि उनके बयान पर तमाम अतिवादी हिन्दू आगे आकर अपनी जान दे देंगे और आगे उनकी राह हमेशा की तरह निष्कंटक रहेगी। ना चरमपंथी रहेंगे ना वे इस चरमपंथी को चुनौती देंगे। आखिर हिन्दुओं की सुशील छवि का भी तो सवाल है। इस तरह सारे अतिपंथी हिन्दू सामने आकर शहीद हो जाएंगे तो बचे हुए हिन्दू खुद सुशील कहलाएंगे। राम राम सत्य है...
Wednesday, November 26, 2008
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1 comments:
बाल ठाकरे के शरीर में तो अब इतनी शक्ति नहीं है लेकिन जुबां में अब भी वही चिरपरिचित तीखापन बरकरार है. कुछ भी हो, जब तक अपना घर बार अपनी ज़िन्दगी दांव पर लगाकर भावुक लोग इनके बहकावे में आते रहेंगे, इनकी जुबां यूँ ही ज़हर उगलती रहेगी. आज हिंदू आतंकवादी की बात करने वाले ज़रा सोचें कि कभी धर्म, कभी जात, तो कभी क्षेत्र के नाम पर लोगों को लडाते समय आप ये क्यों नहीं सोचते.
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